ध्वस्त होती भारतीय न्याय व्यवस्था !
विष्णु तिवारी उम्र 43 वर्ष निवासी जिला ललितपुर राज्य यूपी, 20 साल बाद हाई कोर्ट इलाहाबाद में एक आदेश के द्वारा इन्हें 20 साल पहले हुए केस में बरी कर दिया, कोर्ट ने माना जो साक्ष्य आए हैं वह विष्णु को सजा देने के लिए पर्याप्त नहीं थे यानी कि निचली कोर्ट द्वारा जो उनको सजा दी गई थी वह सही नहीं थी । अब 42 वर्ष की अवस्था में विष्णु बाहर आते हैं जब वह जेल से बाहर आते हैं तो जेल प्रशासन द्वारा उन्हें ₹640 दिए जाते हैं मतलब यह कि यह ₹640 उनके 20 वर्ष की पूंजी है।कल्पना कीजिए यदि यह व्यक्ति जेल में ना होता तो क्या यह सिर्फ ₹640 कमा पाता अपने 20 वर्ष के जीवन में। बिल्कुल नहीं !
जेल से बाहर आते ही विष्णु तिवारी कहते हैं मैं अंदर से टूट गया हूं मेरे पास कुछ नहीं बचा इन 20 सालों में, मैं परिवार नष्ट हो गया, एक भाई है जो मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं है। मेरी शादी ही नहीं हुई है और ना ही अब हो पाएगी मेरा वंश यहीं खत्म हो जाएगा। कौन है इसका जिम्मेदार ?
20 वर्ष पहले उन्हीं के गांव की रहने वाली एक महिला ने उन पर बलात्कार के आरोप लगाए थे क्योंकि महिला अनुसूचित जाति की थी तो एसटी एससी एक्ट भी लगा। कोर्ट में सुनवाई हुई यह सिद्ध करने के बाद भी की इन दोनों पार्टियों के बीच जमीन का विवाद चल रहा था बावजूद इसके उन्हें निचली अदालत द्वारा सजा सुना दी गई। सजा के बाद उन्होंने अपील भी की लेकिन दुर्भाग्य है कि अपील को सुनने में कोर्ट को 20 साल लग गए, तब तक तो उनका जीवन तबाह हो चुका था।
ऐसी केशों की कमी नहीं है, भारतीय न्याय व्यवस्था की ना कामयाबी को दिखाते हुए ऐसे बहुत सारे केस अक्सर हमें देखने व सुनने को मिलते हैं। ऐसे बहुत सारे लोग हैं जिनके खिलाफ में झूठी रिपोर्ट की जाती है। झूठी रिपोर्ट होने के बाद भी पुलिस उनकी कोई उचित जांच नहीं करती और चालान पेश कर देती है और उसी चालान के साक्ष्यों के हिसाब से कोर्ट इन बेकसूर लोगों को सजा भी दे देती है और अपील निपटते निपटते वर्षों बीत जाते हैं।वैसे कानून में यह प्रावधान है कि सजा काटने वाले व्यक्ति को उसके अच्छे आचरण के आधार पर सजा में कमी की जा कर उसे पहले भी छोड़ा जा सकता है, लेकिन ऐसा तो सिर्फ उन लोगों के साथ ही किया जाता है जिनके जेब में पैसे होते हैं।गरीबों के लिए इस देश में अब न्याय कहां बचा है। सच है न्याय तो बस उन लोगों के लिए है जिनकी जेब में मोटी मोटी गड्डियां होती है।
इस निरंकुश अहंकारी न्याय व्यवस्था से हम न्याय की आशा कैसे कर सकते हैं, यह कैसी व्यवस्था है जिसमें न्यायपालिका किसी के लिए जिम्मेदारी नहीं है, आप जाइए कभी किसी कोर्ट में और जज साहब से किसी ऐसे विषय पर बहस कीजिए जो उनके मत के अनुकूल नहीं है तो देखें जरा उनको कैसा गुस्सा आता है। कई बार तो मात्र इसलिए सजा दे दी जाती है कि जज साहब के सामने आरोपी के वकील ने अच्छा व्यवहार नहीं किया या फिर आरोपी ने अच्छा व्यवहार नहीं किया, ऐसी अहंकारी न्याय व्यवस्था जिसके नाक पर हमेशा गुस्सा रहता है उससे हम न्याय की उम्मीद कैसे कर सकते हैं।
